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कलामयी वरदान दो

वरद अमिय बरसाने वाली,
बुद्धिदायिनी शारद माँ।
तमस अविद्या हरने वाली,
मन गुंजित करो शारद माँ।।
वरद अमिय ……………………..
वीणा सी झनकार दो मन को,
हंस सा उज्ज्वल तन मन हो।
नृत्य करे मयूर सा हिय और,
बुद्ध विवेकी हर जन हो।।
शुभ गुण देने वाली मैया,
कण्ठ को सुर और ताल दो।
स्मृति विस्मित करने वाली,
मस्तक को गति चाल दो।।
वरद अमिय ……………………..
उन्नति के पथ पर सब जाएँ,
शुभ कर्मों की राह दो।
दीनों की रक्षा के पथ पर,
सेवा की हमें चाह दो।।
संस्कारमय जीवन होवे,
सुरभित हमें संसार दो।
वादन लेखन कलाकुशल हों,
हमको शुभ हर वार दो।।
वरद अमिय ……………………..
ज्ञानपुंज फैलाने वाली,
अनुपम शुभ हमें ज्ञान दो।
हम सब शरण तुम्हारी मैया,
कलामयी वरदान दो।।
अंतर्मन में जोत जलाओ,
आभामय आकार दो।
जीवन में संगीत भरो माँ,
वेदों का हमें सार दो।।
वरद अमिय ……………………..

माँ नर्मदा जी की स्तुति

जय जगजननी जय मंगलकरणी जय रेवा जगतारिणी माँ।
कर जोड़ के हम सब स्तुति गावें हे मातु सुखकारिणी माँ ।।
तट पर तुम्हरे जयकारे गूँजत सकल सृष्टि जय बोलत माँ ।
घण्टाध्वनि धूप कपूर से आरती जड़ चेतन मिल गावत माँ ।।
माँ मगरमच्छ की करत सवारी शूल कलश श्रीफल धारी।
और सप्त वरण अम्बर तन सोहत तुम्हरी छवि माँ मनोहारी।।
कर में सोहत हैं पुष्प कमण्डल हिय सोहत पुष्पन माला।
सब काज सफल करती हो माँ तुम भक्तन की हो प्रतिपाला।।
माँ नख से शिख शृंगार सुहावत आभा अति मंगलकारी ।
नित चारहुँ वेद बखानत महिमा निशदिन ध्यावत नर नारी।।
माँ छलछलछलछल कलकलकलकल प्रवहत है निर्मल वारि।
तुम्हरो वारि माँ अति गुणकारी रोग दोष नाशनहारी।।
जितने तुम्हरे जल में कंकर माँ सब प्रभु शंकर कहलावें।
सब सुर नर मुनि जन हे माँ रेवा नित तुम्हरी महिमा गावें।।
करतल ध्वनि कर सब झूमत गावत सब तुम्हरी जय बोलत माँ।
सारी सृष्टि तुम्हरी भक्ति में मगन होवे और डोलत माँ।।
जब कृपा तुम्हारी होती है माँ गूँगे को वाणी मिलती।
अंधे को नैनज्योति मिलती और कोढ़ी को काया मिलती।।
जो स्तुति करता माँ की हिय से उसके संकट हरतीं माँ।
सब कारज सफल बनातीं मैया सुख शक्ति यश देतीं माँ।।
जो जन माँ की यह स्तुति गाता यथाइच्छा वह सुख पाता।
गुण ज्ञान सिद्धि बुद्धि सब पाता भवसिंधु से तर जाता।।
यथाबुद्धि तुम्हारी महिमा का ‘शक्ति’ यश वरणत रेवा माँ।
तुम देर न कीजै शरण में लीजै मुक्ति दो हमें रेवा माँ।।